स्कूल

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पिटाई वाले स्कूल

- शिरीष खरे

माधुरी हेकड़े ने स्कूल की किताबें पढ़कर कुछ बनने का सपना देखा था। 10 साल की यह बच्ची परवानी जिले के प्राइमरी स्कूल में पढ़ती थी। माधुरी एक मजदूर परिवार से है। पहले पिता के मना करने पर मां उसे स्कूल भेज देती थी। लेकिन एक रोज माधुरी ने घर के काम में उलझकर स्कूल का होम-वर्क नहीं किया। तब टीचर ने उसकी पिटाई की और स्कूल से बाहर जाने को कह दिया। माधुरी ने यह बात मां को बताई। मां ने टीचर से कुछ नहीं कहा, उल्टा माधुरी को घर और खेत के काम में लगा लिया। अब मां भी स्कूल नहीं जाने नहीं देती। इससे माधुरी का सपना बीच में ही अटक गया है।

‘‘गुरूजी मारे धम्म-धम्म, विद्या आए छम्म-छम्म। मार से बिगड़े बच्चे सुधर जाते हैं। मैं बच्चों में लगातार सुधार देखना चाहता हूं। अनुशासन के लिए ऐसा जरूरी है। अगर मैं पिटाई न करूं तो बच्चे मुझे टीचर नहीं मानेंगे।’’ यह कहना है परवानी स्कूल में माधुरी की पिटाई करने वाले उस टीचर का। लेकिन क्या बच्चे मार से सुधरते और प्यार से बिगड़ते हैं ?

‘चाईलण्ड राईटस एण्ड यू’ के सहयोग से महाराष्ट्र के अलग-अलग इलाकों के स्कूलों में घूमने का मौका मिला। इस दौरान शारारिक और मानसिक हिंसा को लेकर कई बच्चों से बातचीत हुई। बच्चे अपने आसपास की दुनिया को न केवल साफ नजरिए से देखते हैं बल्कि अपनी दिक्कतों की असली वजहों को पहचानते भी हैं।

मेलघाट टाइगर रिर्जव से 40 किलामीटर दूर प्राइमरी स्कूल की दीवार पर लिखा है- ‘‘क्या तुम नहीं जाना चाहोगें किताबों के इस संसार में ? किताबें कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं!!’’ लेकिन 12 साल की कुसुमा भास्कर तो सुबह उठने से लेकर रात को सोते समय तक किताबों के बोझ से दबी महसूस करती है। उसने कहा कि-‘‘मैं पिटाई और पढ़ाई की चिंता में खेल तक नहीं पाती। क्लास में पूछे जाने वाले सवाल जब नहीं बनते तो सबके सामने डांटा, मारा या बेईज्जत किया जाता है। इससे बहुत शर्म आती हैं। कई बार तो जबाव मालूम होने पर भी चुप रहती हूं, इस शर्म से कि कहीं जवाब गलत न हो जाए। तब स्कूल से भाग जाने का मन करता है। कुछ बच्चे तो भाग भी जाते हैं।’’

12वीं में पढ़ने वाले शांतिलाल धाण्डेकर ने बताया- ‘‘ जब कोई बच्चा पहली बार स्कूल जाता है तो सोचता है कि टीचर कैसा होगा, वह कैसे पढ़ाएगा, दूसरे बच्चे उसके साथ रहेंगे या नहीं, वहां का माहौल कैसा होगा ? ऐसे ही कई सवाल उसके दिमाग में रहते हैं। वह जिस जगह पर बैठता है वहां पर अच्छे व्यवहार की उम्मीद करता है। यही उम्मीद उसे अंदर से मजबूत बनाती है। जब ऐसा नहीं होता तो बच्चा निराश हो जाता है। तब वह स्कूल जाने में आना-कानी करता है।’’

उस्मानाबाद जिले से करीब 100 किलोमीटर दूर बाभल गांव का हितेन शिंदे पहली में पढ़ता है। उसके बारे में कहा जाता है कि वह दिमागी तौर से ठीक नहीं है। टीचर उसे प्यार की बजाय छड़ी से समझाना चाहता है। एक रोज टीचर ने हितेश को इतने जोर से चिल्लाया कि उसने पेशाब कर दी। तब से कोई बच्चा उसे अपने पास नहीं बुलाता। अब हितेन क्लास में सबसे पीछे और अकेला बैठता है।

नागपुर के गंगानगर बस्ती में 14 साल के मनीष सोनाबने ने कहा कि-‘‘स्कूल में हमारी हालत देखने के लिए कोई नहीं आता। लोग कहते हैं कि स्कूल तो सरकारी है, इसलिए वहां पढ़ने वाले बच्चे भी ‘ऐसे ही’ है। पढ़े तो ठीक, न पढ़े तो भी ठीक।’’ बीड़ से 60 किलोमीटर दूर धामनगांव में 5वीं की ज्योति सातपत्रे ने बताया कि-‘‘स्कूल में जो खाना बनता है, उसमें बहुत ज्यादा पानी मिलाया जाता है। खाना बनाने के काम में बच्चों को लगाने से दोपहर की पढ़ाई रूक जाती है। इसी गांव की साहिबा, मंगला, सीता, गंगु और लता ने बातों ही बातों में बताया कि चाहे घर हो या स्कूल, लड़कियों के साथ हर जगह भेदभाव होता है।

14 साल की साहिबा ने कहा- ‘‘टीचर बच्चों के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा वह अपने बच्चों के साथ करते हैं, या उनसे चाहते हैं। अगर आज हमारे साथ बैठकर हमारी बातें नहीं सुनेंगे, तो कल हम भी उनके पास जाकर उनकी बातें क्यों सुनना चाहेंगे ?’’